
तस्वीरें सामने आने के बाद फिर उठे सवाल, शिकायत-ज्ञापन के बावजूद कार्रवाई का इंतजार
कोरबा | जिले में बरसात के दौरान रेत उत्खनन और परिवहन पर प्रतिबंध के बावजूद गेरवाघाट क्षेत्र में रेत का कारोबार जारी रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। खास बात यह है कि इस मामले को लेकर कई बार समाचार प्रकाशित हो चुके हैं, कलेक्टर को ज्ञापन दिया जा चुका है और स्थानीय जनप्रतिनिधियों व पार्षदों ने भी खुलकर विरोध दर्ज कराया है। पत्रकारों द्वारा भी प्रशासन का ध्यान इस ओर दिलाए जाने की बात सामने आई है, लेकिन इसके बावजूद स्थिति में कोई खास बदलाव नजर नहीं आने की चर्चा है।

गेरवाघाट की स्थिति को लेकर अब क्षेत्र में व्यंग्यात्मक चर्चाओं का दौर भी शुरू हो गया है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जिले के दूसरे घाटों पर प्रतिबंध और कार्रवाई दिखाई देती है, तो फिर गेरवाघाट में नियमों की गाड़ी आखिर किस ईंधन से दौड़ रही है?
ऐसे में गेरवाघाट की कहानी भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है। जिले में बरसात के नाम पर रेत उत्खनन पर प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन गेरवाघाट में सुबह की तस्वीरें देखकर ऐसा लगता है मानो यहां प्रतिबंध की तारीख अभी पहुंची ही नहीं है। बाकी घाटों पर नियमों का डंडा चलता है और यहां रेत का कारोबार—यह फर्क आखिर किस व्यवस्था की ओर इशारा करता है? स्थानीय लोगों की जुबान पर अब यही सवाल है कि क्या गेरवाघाट के लिए भी वही नियम हैं, जो जिले के बाकी घाटों के लिए लागू हैं।
बाजार में चर्चा तो यहां तक है कि गेरवाघाट में कार्रवाई इतनी आसान नहीं है। कहा जाता है कि वहां पहुंचने के लिए अधिकारियों को कोहड़िया से होकर गुजरना पड़ता है और जैसे ही अधिकारी कोहड़िया से गुजरते हैं, कार्रवाई के लिए बढ़ते कदम वहीं थम जाते हैं। आखिर रास्ते में ऐसा कौन-सा ‘ब्रेक’ है, इसका जवाब जिम्मेदार अधिकारी ही बेहतर दे सकते हैं।

अब सुबह सामने आई तस्वीरों ने पूरे मामले को फिर चर्चा में ला दिया है। सवाल यह है कि यदि बरसात में रेत उत्खनन पर प्रतिबंध है, तो तस्वीरों में दिखाई दे रही गतिविधियों की जांच कौन करेगा?
क्या संबंधित विभाग मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति की जांच करेगा या फिर यह मामला भी शिकायतों और ज्ञापनों की फाइलों में ही दबा रहेगा?
फिलहाल गेरवाघाट की सुबह की तस्वीरें प्रशासन के लिए एक सीधा सवाल छोड़ रही हैं — प्रतिबंध कागज पर है या घाट पर भी?



